Sunday, 9 December 2012

सोमरस की मनमोहक महक ,मधुशाला में छाई है ! 604-608

604
हाला पीकर निडर हुआ  मन ,कह गया कभी  जो न  कहने पाया !
हाला को अपने गले गले लगाकर , प्रियतम प्यारी सा प्यार भी पाया !!
605
जब मै पहली पहली बार गया मधुशाला ,झूम झूम कर गा रही थी ,
चंचल हसीं प्यारी सुरबाला ,जाम पिलाके उसने यारो दीवाना बना डाला !!
606
मेरी डगर निहार रही थी ,सर्वस्व अपना वार रही थी !
पथिक मनोहर अंजान डगर का ,क्यों मेरी राह निहार रही थी !!
607
मनु मनु पुकार रही थी ,तेरी ही डगर निहार रही थी !
मधु आलिंगनबद्ध होने को ,मधुशाला के द्वार खड़ी थी !!
608
सोमरस की मनमोहक महक ,मधुशाला में छाई है !
पथिक मनोहर से मिलने ,सुरबाला मधुशाला आई है !!

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव