Tuesday, 28 April 2015

आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है

आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया  है
आज उसका जमीर शायद मर गया  है
इंसानियत का वो खू कर गया  है
अपनी ही जमीर से वो डर गया है
आज कलयुगी मानव बहुत बढ गाय है
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आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है
पतन की गड्ड मे वो गिर गया है
मौत के भय से वो डर गया है
मानवता को वो कुचल गया है
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आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है
खून के रिश्तो का वो कत्ल कर गया है
इन्सानियत के भय से वो डर गया  है
इस युग को अलविदा  क्यो न कहे हम
आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है 
                     

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खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव