Thursday, 30 April 2015

बहुत बोलती है ये नज़रे तुम्हारी

बहुत बोलती है ये नज़रे तुम्हारी

101

हमसे जितना दूर जाओगे तुम ,उतना ही अपने करीब पाओगे तुम !

हमें जितना भुलाओगे तुम ,उतना ही ज्यादा याद आओगे तुम !!

102

नजरो से भले ओज़ल हो जाओ ,दिल से निकालने ना पाओगे तुम !

अब तो कैदी हो तुम मेरे दिल के ,भाग कर अब कहाँ जाओगे तुम !!

103

जहाँ तक जायेंगी नजरे तुम्हारी , हमी हम को पाओगे तुम !!

बहुत कातिल है नजरे तुम्हारी ,बिना खंजर के मार गिराओगे तुम !!

104

तुम्हारी हर अदा बहुत है निराली , कबतक उन्हें छुपाओगे तुम !!

संगेमरमर सी सुन्दर है काया तुम्हारी , कबतलक बुरके में छिपाओगे तुम !!

105

सारा जहाँ है आशिक तुम्हारा , कबतलक खुद को बचाओगे तुम !

 मेरे दिल को अपना कुटीर बना लो , यही रहकर खुद को बचा पाओगी तुम !!  

106

पथिक मनोहर रस्ता निहारे , और कबतलक तडपाओगे तुम !!

अब तो यौवन भी ढलने लगालगा है , और कितना इनतजार करवाओगे तुम 107

बहुत बोलती है ये नज़रे तुम्हारी , इनपे भला काबू तुम पाओगी कैसे !

नागिन  सी बलखाती ये झुल्फे तुम्हारी , इनको सजा पाओगी कैसे !!

 108

 बहुत ही कातिल है नजरे तुम्हारी ,ज़माने को इनसे बचओगी कैसे !

मखमल से कोमल लब है तुम्हारे , मुझसे प्यार पाओगी कैसे !!

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव