Monday, 6 July 2015

महबुबे मोहब्बत शेरो शायरी की जान होतीं है। तनहाई आंशिक की बगल मे करवट बदल के सोती है लब खामोश रहते है मोहब्बत नजरों से बयाँ होती है लफ्ज दिल से निकलते है कलम माला पिरोती है

महबुबे मोहब्बत शेरो शायरी की जान होतीं है।
तनहाई आंशिक की बगल मे करवट बदल के सोती है
लब खामोश रहते है मोहब्बत नजरों से बयाँ होती है
लफ्ज दिल से निकलते है कलम माला पिरोती है

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव