Wednesday, 22 July 2015

ढल गई शाम

ढल गई शाम...तेरे इन्तझार मे
ढल गई रात...तेरे इन्तझार मे
चार पहर बीतने पे सबेरा होगा.....तेरे इन्तझार मे
वो नही मेरा होगा
इन्तहा हो गई इन्तझार की.....तेरे इन्तझार मे

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव