Thursday, 6 August 2015

हमाम

इस हमाम मे
सभी विवस्त्र
सब कुछ यहाँ बिकाऊ
मानवता विहिन
सभी लोग यहाँ
इस हमाम मे मानवता कत्ल हो गई
जम्हूरियत
सरेआम विवस्त्र
जिस्म यहाँ बिकते
रूहे बिकती नही
दिल मे अरमानो का
अंजाम
फकत और फकत
मौत हो मई
मोल भाव चल रहा
भाग्य
मानो मानवता को
सरेआम छल रहा
स्त्रियाँ फकत भोग्या हो गई
इन्सानियत की मंडी मे खो गई
स्त्रियाँ फकत गुलाम
आतंकियो का ईनाम
बिकने को मजबूर हो गई
मंडी
आदमियत की
मानवता कोने मे दुबक कर खड़ी हो गई
जिस्म की बोली लगना
आज जम्हूरियत के आगे आतंकियत खुदा हो गई।

No comments:

Post a Comment

खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव