इस हमाम मे
सभी विवस्त्र
सब कुछ यहाँ बिकाऊ
मानवता विहिन
सभी लोग यहाँ
इस हमाम मे मानवता कत्ल हो गई
जम्हूरियत
सरेआम विवस्त्र
जिस्म यहाँ बिकते
रूहे बिकती नही
दिल मे अरमानो का
अंजाम
फकत और फकत
मौत हो मई
मोल भाव चल रहा
भाग्य
मानो मानवता को
सरेआम छल रहा
स्त्रियाँ फकत भोग्या हो गई
इन्सानियत की मंडी मे खो गई
स्त्रियाँ फकत गुलाम
आतंकियो का ईनाम
बिकने को मजबूर हो गई
मंडी
आदमियत की
मानवता कोने मे दुबक कर खड़ी हो गई
जिस्म की बोली लगना
आज जम्हूरियत के आगे आतंकियत खुदा हो गई।
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Thursday, 6 August 2015
हमाम
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खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं । मनोहर यादव
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