मेरी महबुबे मोहब्बत शोख हँसी
ज्यों जन्नते हूर सजल
रोज है गुजरती मेरे घर की डगर
आशिक की बेपनाह मोहब्बत मे कैद
अपनी जिन्द से भी ज्यादा मोहब्बत
कोई चाहत लगाव मेल मिलाप न था
जब गुजरती तो महकती अंजान डगर
उसके जुड़े मे गुथे शेफाली के फुलो की महक
नजरें दीदार ए यार की लगती प्यासी फकत
साँसे ठहरती उसके इन्तझार मे फकत
उसके हाथों की हिना की महक
जैसे बसंत ने ली अंगडाई फकत
उसकी जुलफे जब लहराई फिजा
ज्यो भेजी देवराज ने सेना
पाक दामन वो महबुबे मोहब्बत
मै जैसे कंटीले बंबूल की शाख
जिसपे काले कौवे की विला
ये सब कुछ जैसे मेरे मानिन्द
मेरी जिन्दगी के हरेक लम्हात मे शुमार
दिल की चाहत यु ही महबुबे मोहब्बत गुजरती रहे
जब तक जिस्म मे रूह शामिल है फकत
दीदार ए यार से रौशन होती सुब
साँझ ढलती है महबुब की अंगडाई से।
चाँदनी खिलती पलकों के इशारे से
रात परवान चढती जब वो गिराती पलके।
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Saturday, 29 August 2015
मेरी महबुबे मोहब्बत
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