Saturday, 21 November 2015

नवाबो के शहर

नवाबो के शहर की धूल से भी गजल निकलती है
आंधियो के चलने भर से शमां ए मोहब्बत मचलती है
लखनवी गलियो मे रात ढले जब चाँदनी छिटकती है
ऐसे मे आशिको की मोहब्बत सरेशाम निखरती है

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव