और भी गम है जमाने मे सिवा मोहब्बत के मेरे यार
तूही बता कैसे कह दू नही करता मै तुझसे प्यार
एक पल भी जीना दुश्वार होता है बगैर दीदारे यार
तूही बता कैसे आखिर क्यो करू महबूबे मोहब्बत से इन्कार
सिर्फ एक तूही है तूही की कली दिसपे कुर्बान जानो जिगर मेरे यार
मरते दम तुझसे मोहब्बत न होगी कम करता रहूँगा तेरा इन्तजार
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Tuesday, 15 December 2015
और भी गम है जमाने मे
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खामोशियो की सागिर्दगी
खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं । मनोहर यादव
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