मम कृति लहूलुहान आज है भौंडा ये सोभ्य समाज
रिश्ते सब तार तार हो चुके बिखर चुकी ये जिन्दगी जहाँ
आसमां का चाँदनी भी सहमी सहमी सकुची सी कसक लिये मनमे
अंजान डगर का खौफ लिये मन मे आगे बढ रही कुछ सकुचाई
नींद भी खौफजदा सी लगती जाने क्या हो अगले पल
अंजान कृतक वीरान डगर कुम्लाई सकुचाई नन्ही कुमुदनी
भोर का तारा लगता प्यारा एक आस विश्वास लिये मन मे
बढते लगती अपनी डगर सजल सजग नन्ही कुमुदनी
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Friday, 5 February 2016
मम कृति
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खामोशियो की सागिर्दगी
खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं । मनोहर यादव
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