सहराओं में बुझती नहीं प्यास
सारी नदियाँ सूखी सूखी सी
लगती है बदहवास
सूर्य की कडकती धूप में
जिन्दगी भी हुई बदहवास
चिलचिलाती धूप में गगनचर
हुये बदहवास
सूनी हो गई सडके सारी जिन्दगी पुन: हो गई उदास
पेड पौधे सब के सब जीव जन्तु जगत के बदहवास
चारों ओर जिन्दगी बोरयाई कुछ नजर नही आता खास
बुझती नही दिली जख्मों की प्यास टूटे हुये दिल की आस
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Saturday, 30 April 2016
सहराओं में बुझती नही प्यास
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