Saturday, 30 April 2016

सहराओं में बुझती नही प्यास

सहराओं में बुझती नहीं प्यास
सारी नदियाँ सूखी सूखी सी
लगती है बदहवास
सूर्य की कडकती धूप में
जिन्दगी भी हुई बदहवास
चिलचिलाती धूप में गगनचर
हुये बदहवास
सूनी हो गई सडके सारी जिन्दगी पुन: हो गई उदास
पेड पौधे सब के सब जीव जन्तु जगत के बदहवास
चारों ओर जिन्दगी बोरयाई कुछ नजर नही आता खास
बुझती नही दिली जख्मों की प्यास टूटे हुये दिल की आस

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव