Tuesday, 17 May 2016

आन्धियो के चलने से

मुक्तक 1

 आन्धियो के चलने से परीन्दओ के नीड उजडते है 

बाग मे कालियो के खिलने से भवरो के दिल मचलते है 

2 खुद की पराछियो से ही अब वो डरने लगे है 

अपने हाथ मे खंजर लिये पराछियो से ही लडने लगे है 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव