१८५ मेरी आधुनिक मधुशाला
भोर का रक्तिम सूरज साकी बन आज आया मेरी आधुनिक मधुशाला
स्याह लालिमा और उसके नूर से गूँज उठा मेरी मधुशाला का चौबारा
अपने हाथो से कृतक अंजान मनोहर को पिलाई उसने शबनमी हाला
रूपसी की सागरमय के जादू ने अपना गुलाम परदेशी को बन डाला
भोर का रक्तिम सूरज साकी बन आज आया मेरी आधुनिक मधुशाला
स्याह लालिमा और उसके नूर से गूँज उठा मेरी मधुशाला का चौबारा
अपने हाथो से कृतक अंजान मनोहर को पिलाई उसने शबनमी हाला
रूपसी की सागरमय के जादू ने अपना गुलाम परदेशी को बन डाला
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