Tuesday, 14 June 2016

१८५ मेरी आधुनिक मधुशाला

१८५   मेरी आधुनिक मधुशाला 

भोर का रक्तिम सूरज साकी बन आज आया मेरी आधुनिक मधुशाला 
स्याह लालिमा और उसके  नूर से गूँज उठा मेरी मधुशाला का चौबारा 
अपने हाथो से कृतक अंजान मनोहर को पिलाई उसने शबनमी हाला 
रूपसी की सागरमय के जादू ने अपना गुलाम परदेशी को बन डाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव