जिन्दगी रब की इनायत है
कभी इबादत रब की है जिन्दगी
दर्दे दिल दर्दे जिगर इनायत उनकी
जो महबूबे मोहब्बत बन दिल में बसे हैं हमारे
जिन्दगी मेरी बीत गई कारवाओं में
कभी सहराओ की मदमस्त हवाओं में
इस जिस्म की रूह पाक परवरदिगार कन्हाई
जिसकी मोहब्बत मे सारे जहाँ की दौलत बिसराई
मनोहर यादव " अमृत सागर "
कभी इबादत रब की है जिन्दगी
दर्दे दिल दर्दे जिगर इनायत उनकी
जो महबूबे मोहब्बत बन दिल में बसे हैं हमारे
जिन्दगी मेरी बीत गई कारवाओं में
कभी सहराओ की मदमस्त हवाओं में
इस जिस्म की रूह पाक परवरदिगार कन्हाई
जिसकी मोहब्बत मे सारे जहाँ की दौलत बिसराई
मनोहर यादव " अमृत सागर "
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