चाँदनी रात में शायें गजब ढाने लगे हैं
पूनम की रात हमें वो नजर आने लगें हैं !
पानी पानी हम अपना मुकद्दर सजाने हैं
दिली उमंगों और ख्वाहिशों पर पानी फिराने लगे हैं !
मनोहर सरेशाम साजिशों में घिरे नजर आने लगे हैं
जिस डाल पर बैठे गालिब उसी पर कुल्हाडी चलाने लगे हैं
खुश्क शाखों पर खुबसूरत पत्ते नजर आने लगे हैं
मनोहर पतझड को बसंत जुबाँ चिढाने लगे हैं
महुओं की मादक महक दिल लुभाने लगी है
बासंती पवनों हरेक ओर रति नजर आने लगी है
पर्दे से बाहर पलाश की नन्हीं कली मुस्काने लगी है
अपनी खुबसूरती से वसुन्धरा पर गजब ढाने लगी है
बासंती फिजाओं में महबूबे मोहब्बत जिस्म पे छाने लगी है
सरोवर में कुमुदनी की तरूणाई आलम दिखाने लगी है
अब तो करो शंय में तूही तू यार नजर आने लगी है
महबूब की तरूणाई बसंत में जादू अपना चलाने लगी है !
मनोहर यादव " अमृत सागर "
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