Friday, 30 November 2012

आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है

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आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया  है

आज उसका जमीर शायद मर गया  है

इंसानियत का वो खू कर गया  है

अपनी ही जमीर से वो डर गया है

आज कलयुगी मानव बहुत बढ गाय है

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आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है

पतन की गड्ड मे वो गिर गया है

मौत के भय से वो डर गया है

मानवता को वो कुचल गया है

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आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है

खून के रिश्तो का वो कत्ल कर गया है

इन्सानियत के भय से वो डर गया  है

इस युग को अलविदा  क्यो कहे हम

आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है

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खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव