Tuesday, 4 December 2012

मधुशाला की शोभा बाढती सुंदर सुंदर बारबालये

1

कलयुग की मादुशाला मे ,जरुरत नही है प्याले की 

यहा सुंदर मनोहर बारबालये ,अपने लब से पिलाती है हाला

2

मै कृतक मनोहर ,पथिक हू ,मै एक अंजान डगर का

मै जान गया हु क्यो लोग धुंढते है राह सदा मधुशाला की .

3

मधुर हाला के दो पैग यारो ,सारा गम हर लेते है

अपने आगोश मे लेकर ,मीठी नींद सुला देते है

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पहले जमाने मे हर पांच कोस पर होती थी मधुशाला

इस कलयुग मे यारो देखो ,हर घर मे हाला का है डेरा

5

मधुशाला की शोभा बाढती सुंदर सुंदर बारबालये

कर मै सागर मय लेकर , प्याला पीलाती बारबाळाये

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव