Saturday, 15 December 2012

लाखों पथिक है आते मधुशाला ,सागर मय से पीते हाला ! कु

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 टप टप  टप टप ,मधुशाला में टपक रही थी चंचल हाला सागर मय से  !

पथिक मनोहर खूब बदल रहे थे ,प्यालों पे प्याला ,हाला का स्वाद बड़ा निराला !!

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भरते जाते थे प्याले पे प्याला ,कभी ना होती खली सागर मय !

अक्षय सागर मय थी सुरबाला की , देवलोक से लाई थी !!

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लाखों पथिक है  आते मधुशाला ,सागर मय से पीते हाला !

कुछ पल ठहर थकान मिटाते ,प्यास बुझाती सुरबाला !!

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जब कभी फिर याद सताती , राह पकड़ते मधुशाला !

दौड़े दौड़े भागे आते ,प्यास बुझाते पीकर हाला !!

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हाला का मतवाला स्वाद एक बार पथिक जो चख लेता !

फिर कभी ना वह भुला पाता ,मधुशाला और चंचल सुरबाला !!

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कलयुग में सभी जगह सुशोभित है मधुशाला !

नित्य सुबह उठ भोग लगाते ,पसाद है पाते चंचल हाला !!




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खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव