628
तुम्हारे आने से रौशन है फिज़ा ,दीवानगी का आलम है ,
मदमस्त है चारो दिशाए ,बासंती पवन बहने लगी है उनचास !!
629
अंगारे से सुर्ख है लब तुम्हारे ,नैनों से छलक रही है हाला !
तुमसी पिलाने वाली सुरबाला ,मुझ सा पथिक हो पीने वाला !!
630
सांझ ढले गगन तले ,पक्षी अपने नीड़ चले
कदम पथिक के आटोमेटिक ,उस ओर चले उस ओर बढे
जहाँ मधु है मधुशाला है ,प्यालों से छलकती हाला है !
जहाँ राह निहारती सुरबाला है ,महफ़िल में सजा मय का प्याला है !!
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संगीत मनोहर स्वर नुपुर तुम्हारे ,गीत मधुर सावन में प्यारे !
आँखों से छलकती हाला है , लब तुम्हारे सुर्ख अंगारे !!
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प्रियतम तुम गाओ कोई गीत नया ,महफ़िल में क़यामत आ जाये !
बसंत में छा जाये काली घटा , और मधुशाला में हाला बरसाये !!
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