Sunday, 9 December 2012

आन्धियो के चलने से परीन्दओ के नीड उजडते है

आन्धियो के चलने से परीन्दओ के नीड उजडते है
 बाग मे कालियो के खिलने से भवरो के दिल मचलते है  
2
खुद की पराछियो से ही अब वो डरने लगे है 
अपने हाथ मे खंजर लिये  पराछियो से ही लडने लगे है  
 3
वह ह्वाए जो पूरब से आती है मौसम बदलने का संदेश लाती है 
प्रात:भ्रमण को निकले हम आस पास की रौनके दिल को छू जाती है 
4
जब से बडी है दूरिया मंजिल दूर हि दूर नजर आती है 
कभी तो सुबह होगी इस इन्तजार मे सारी रात   गुजर जाती है 
5
वो जो दिन के उजालों में भटक गये थे कही 
शायद रात  के अंधेरे उन्हे सही रस्ता दिखा दे

No comments:

Post a Comment

खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव