Sunday, 9 December 2012

मानवता को वो कुचल गया है

1
आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया  है
आज उसका जमीर शायद मर गया  है
इंसानियत का वो खू कर गया  है
अपनी ही जमीर से वो डर गया है
2
              
               आज कलयुगी मानव बहुत बढ गाय है               
आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है
पतन की गड्ड मे वो गिर गया है
मौत के भय से वो डर गया है
3
                    मानवता को वो कुचल गया है                   
आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है
खून के रिश्तो का वो कत्ल कर गया है
इन्सानियत के भय से वो डर गया  है
4
इस युग को अलविदा  क्यो न कहे हम
आज कलयुगी मानव बहुत बढ गया है 
           आज उसका जमीर शायद मर गया  है          
इंसानियत का वो खू कर गया  है

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खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव