Thursday, 30 April 2015

जब से बडी है दूरिया मंजिल दूर हि दूर नजर आती है कभी तो सुबह होगी इस इन्तजार मे सारी रात गुजर जाती है

आन्धियो के चलने से परीन्दओ के नीड उजडते है
 बाग मे कालियो के खिलने से भवरो के दिल मचलते है  
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खुद की पराछियो से ही अब वो डरने लगे है 
अपने हाथ मे खंजर लिये  पराछियो से ही लडने लगे है  
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वह ह्वाए जो पूरब से आती है मौसम बदलने का संदेश लाती है 
प्रात:भ्रमण को निकले हम आस पास की रौनके दिल को छू जाती है 
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जब से बडी है दूरिया मंजिल दूर हि दूर नजर आती है 
कभी तो सुबह होगी इस इन्तजार मे सारी रात   गुजर जाती है 
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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव