Thursday, 2 July 2015

महत्वाकाँक्षा

हार ना ही कभी मानी है
और कभी नही मानुँगा
दिल मे जो ठानी है
वही करता जाउँगा
अपनी डगर पे चलते चलते
मंजिल मैंने पानी है
अंजान डगर
सुनसान डगर
कटीली और पथरीली डगर
राह कृतक रोक ना पायेगी
मंजिल खुद ब खुद आकर
कदमों पे नतमस्तक हो जायेगी
झुम उठेगी फिजा
कायनात खुशगवार हो जायेगी
मेरी फतेह के नग्मे सुनकर
इन्द्र धनुषी स्वर लहरी
अपना रूतबा दिखायेगी

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव