बाद मुद्दत के महबुब का दीदार किया
जमाने की रफ्तार कभी धीमी कभी तेज
महबुब से बहुत दूर जिस्मानी तौर पर
रूहानी तौर पर दो जिस्म फकत एक रूह
जमाने की नजरो मे मोहब्बत चढ गई
नफरत भरी नजरें मजबूत दीवार की शक्ल मे
मेरी महबुब को इन हकीकतो का कोई गुमाँ नही
मै भी कैद हू जमाने के जंजाल मे
मेरी रूह जिस्म मे सजायाफ्ता महसूस होती है
हलाते हाजरा पे यकीन है महबुब को
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Saturday, 29 August 2015
बाद मुद्दत के महबुब का दीदार किया
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खामोशियो की सागिर्दगी
खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं । मनोहर यादव
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रात कविता सपने आई देने लगी मोहब्बत की दोहाई पृियतम तोहे नींद कैसे आई तेरी मोहब्बत ने मेरी निंदिया उडाई
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