Saturday, 29 August 2015

तमाम तोहफे जुटाए थे उसकी खातिर

तमाम तोहफे जुटाये थे उसकी खातिर
जब कभी मुन्तखिब होंगे
महबुब को दिल के हँसी टुकड़े रास आयेगे
कुछ रूमाल नेल पालिस बाड़ी लोशन महकते हुये खस
जाने क्या क्या जुटा रखा है दिले नादाँ
महबुबे मोहब्बत की इष्क मे लबरेज बातें
एक दुजे की बाहो मे गुजरी वो चाँदनी राते
तनहाईयो मे की थी जो मोहब्बत की बातें
गुलशन मे हुई वो तमाम रंगी मुलाकाते
वो रूखशार पे बोसो के निशा
मोहब्बत भरी कस्मे मेहबुब के वादे
वो तमाम खामोशीया गवा ए मोहब्बत ।

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव