रात अशांत खामोश
नींद गुमराह मदहोश
आलिशान महलो मे
नामों निशा नही चैनो अमन
दूर बहुत दूर चिरागो का नूर
वादी के मकानों मे जुगनू सी
झिलमिलाती शमाँ
मुस्कराते हुये मेरे महबुब
गगनचुम्भी अटटालिकाये
गुर्जर के मादक तरानो की गूँज
शिलाजीत सी महकती वादिये काश्मीर
जन्नत वसुन्धरा सबब ए जिन्दगी
खामोशी पैर पसारे जैसे कब्रगाह का आलम
जख्मी रूह की कराह बैचेनी का सबब
मेहबुबे मोहब्बत से जुदाई का गम
कैसे भुलाउ शिकारे मे गुजारे जन्नत से पल
बेबसी का आलम हवा भी ठहरी है कही
केसर की महक आरजुये जिन्दगी का सबब
खामोश मदहोश रातों की वीरानगी
डगर खामोश नगर खामोश
मदहोश मोहब्बत दिलो की उमंग
अंजान डगर
महबुबे मोहब्बत सबब ए जिन्दगी
खामोश शहर।
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Friday, 28 August 2015
रात की खामोशी
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खामोशियो की सागिर्दगी
खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं । मनोहर यादव
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रात कविता सपने आई देने लगी मोहब्बत की दोहाई पृियतम तोहे नींद कैसे आई तेरी मोहब्बत ने मेरी निंदिया उडाई
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