शीशे के घरोदो को बसाया नही जाता।
महबुबे मोहब्बत को भुलाया नही जाता ।
कुछ रिश्ते अम्बर से बनके यार आते है।
कुछ रिश्ते धरा पर आदमियत से निभाये जाते है।
गुलाब की कली भँवरे की गुँजन से वाकिफ यार होती है।
परदेशी अंजान डगर के भँवर की मोहब्बत की तलबगार होती है।।
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