Tuesday, 1 September 2015

घोर घने जंगल मे

उँचे घनेरे दरख्तो के घमासान बियाबान जंगल मे
भाग दौड़ भरी परिस्थितियों मे
लम्हा लम्हा गुजर रही है जिन्दगी मेरे महबुब
महबुबे मोहब्बत के दीदार से शुकून दिल को आया
कमसिन मासूम जन्नते हूर की झलक जैसे जेठ की तापती धूप मे सावन की बदरिया बरसी
दिल ही दिल मे नूरे नजर को आगोस मे लेके
सावन की बदरिया ने घमासान मचाया मेरे मैखाने के चौबारे
दिल को तसल्ली मिली मिला चौनो शुकून अपार
जन्नते हूर के बिखरे गेसू
जैसे देवराज की चतुरंगिणी सेना आ पहुँची मेरे द्वार

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव