Saturday, 5 September 2015

साँवरा

जर्रे जर्रे से साँवरियाँ की महक आती
सारी कायनात दिन रात कान्हा को ध्याती
कृष्ण की बाँसुरी की तान दीवाना जहाँ को बनाती
दीवानी गोपिया कृष्ण मुरारी की मोहब्बत मे सुध बुध अपनी भुलाती।

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव