Tuesday, 1 September 2015

कुदरत का कारीगर

कुदरत का कारीगर माटी से इन्सान बनाता और फकत माटी मे मिलाता
धरती का इन्सान माटी से भगवान बनाता और पानी मे बहता
ये वाकया कृतक अंजान डगर समझ नही पाता है
कुदरत के रचियता के चरणों मे शीश अपना झुकाता है
या खुदा तेरी खुदाई अंजान इन्सान समझ नही पाता है
जहाँ मानव निर्मित विज्ञान खत्म होता साक्षात महाँकाल नजर आता है।

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव