कुदरत का कारीगर माटी से इन्सान बनाता और फकत माटी मे मिलाता
धरती का इन्सान माटी से भगवान बनाता और पानी मे बहता
ये वाकया कृतक अंजान डगर समझ नही पाता है
कुदरत के रचियता के चरणों मे शीश अपना झुकाता है
या खुदा तेरी खुदाई अंजान इन्सान समझ नही पाता है
जहाँ मानव निर्मित विज्ञान खत्म होता साक्षात महाँकाल नजर आता है।
Ocean of Merathus ! आज फिर अम्बर के चाँद में दीदारे यार होगा, चँदा से बरसता मेरे महबूब का शबनमी प्यार होगा |
Tuesday, 1 September 2015
कुदरत का कारीगर
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खामोशियो की सागिर्दगी
खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं । मनोहर यादव
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जो दिल के करीब होता है। वो फकत नसीब से होता है। वक्त किसी का अजीज नही है। कर्म से मानव खुशनसीब होता है। कोई हँसता तो कोई रोता ये कर्मो क...
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रात कविता सपने आई देने लगी मोहब्बत की दोहाई पृियतम तोहे नींद कैसे आई तेरी मोहब्बत ने मेरी निंदिया उडाई
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