शाख से टूटके पत्ता संग हवा के जाता है
अपना वजूद हवाओ की दिशाओ में पाता है
जो कोई मानव इक बार परवरदिगार से बिछुड जाता है
इस संसार में यारों अपना अस्तित्व मिटाता है
कभी न भुलाना यारों उस रब को चाहे दुनियाँ रूठे
कभी न भुलाना महबूबे मोहब्बत को चाहे दुनियाँ रूठे
महबूब से जिन्दगी है ये जहाँ है महबूब से
ये धरती ये असमान है मेरे महबूब से
मोहब्बत खुदा नही तो खुदा से कमचतर भी नही
अमृत सागर परिवार मे आपका हार्दिक स्वागत है
Please join amritsagar Friends
Follow the link below
https://m.facebook.com/amritsagarownsms/
No comments:
Post a Comment