हरेक शाम जिन्दगी का हँसी पैगाम लाती है
चाँदनी शबनमी मोतियों की चादर बिछाती है
शेफाली की महक निशा को मादक बनाती है
रूपसी बाला की मादक हाला रात का यौवन बढाती है
चँदा की चाँदनी में मोहब्बत क्या खूब खिलती है
भादों के मेघों में ज्यों बिजूरिया मचलती है
भोर के आँगन में नन्हीं कुमुदनी खिलती है
अंजान डगर के परदेशी भँवर की बाहों में मचलती है
यौवन की दहलीज पर पल पल हरेक पल निशा रंग बदलती है
परदेशी अंजान डगर की बाहों में कुमुदनी फूल बनके निखरती है
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