Monday, 16 May 2016

हरेक शाम जिन्दगी का

हरेक शाम जिन्दगी का हँसी पैगाम लाती है
चाँदनी शबनमी मोतियों की चादर बिछाती है

शेफाली की महक निशा को मादक बनाती है
रूपसी बाला की मादक हाला रात का यौवन बढाती है

चँदा की चाँदनी में मोहब्बत क्या खूब खिलती है
भादों के मेघों में ज्यों बिजूरिया मचलती है

भोर के आँगन में नन्हीं कुमुदनी खिलती है
अंजान डगर के परदेशी भँवर की बाहों में मचलती है

यौवन की दहलीज पर पल पल हरेक पल निशा रंग बदलती है
परदेशी अंजान डगर की बाहों में कुमुदनी फूल बनके निखरती है

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव