१७२ मेरी आधुनिक मधुशाला
दुःख सारे हर लेती खुशियों से दामन सजाती सागरमय हाला
पीके तन मन मस्त हुआ बाला की अमृतसम मादकतम हाला
मेला सा नित ही लगता डगर डगर जब परदेशी आता मधुशाला
कृतक मनोहर प्यास बुझाता पीके यौवनरस हाला मेरी मधुशाला
दुःख सारे हर लेती खुशियों से दामन सजाती सागरमय हाला
पीके तन मन मस्त हुआ बाला की अमृतसम मादकतम हाला
मेला सा नित ही लगता डगर डगर जब परदेशी आता मधुशाला
कृतक मनोहर प्यास बुझाता पीके यौवनरस हाला मेरी मधुशाला
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