Saturday, 11 June 2016

१७२ मेरी आधुनिक मधुशाला

१७२  मेरी आधुनिक मधुशाला

दुःख सारे हर लेती खुशियों से दामन सजाती सागरमय हाला
पीके  तन मन मस्त हुआ बाला की अमृतसम मादकतम हाला
मेला सा नित ही लगता डगर डगर जब परदेशी आता मधुशाला
कृतक मनोहर प्यास बुझाता पीके यौवनरस हाला मेरी मधुशाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव