Saturday, 11 June 2016

१७३ मेरी आधुनिक मधुशाला

१७३   मेरी आधुनिक मधुशाला

राजा को है रंक बनाती जब अपनी पे आती रूपसी बाला
तनमन सबकुछ अर्पण कर देती हाथ से भर भर प्याला
प्याला की मादक हाला में खुद है डुबोता हाला पीनेवाला
होश में जब वो आता हाथ में उसके होता रीता हाला का प्याला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव