Saturday, 11 June 2016

१७१ मेरी आधुनिक मधुशाला

१७१  मेरी आधुनिक मधुशाला

मेरी मधुशाला आने को घर से चलता है सागरमय पीनेवाला
कभी न डगर अपनी भुलाता आ पहुँचता मेरी अपनी मधुशाला
हरेक डगर हरेक नगर सबकी मंजिल मदिरालय अनुपम आला
किसी भी राह परदेशी निकालता आ पहुंचता मेरी मधुशाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव