Sunday, 19 June 2016

२१० मेरी आधुनिक मधुशाला

२१०  मेरी आधुनिक मधुशाला

सदियों की प्यास बुझेगी पीकर सागरमय अमृतसम मादक हाला
परदेशी अंजान डगर जिस पल पहुंचेगा मेरी आधुनिक मधुशाला
सर के बल कृतक अंजान डगर नाचूंगा पी रूपसी की यौवन हाला
सारा जहां सर  झुकाएगा पीके सुरबाला के लबो से टपकती हाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव