१८३ मेरी आधुनिक मधुशाला
पीके बाला की सागरमय हाला झूम उठता है चंचल मन मतवाला
तनमन में अगन लगाती यारों रूपसी बाला की मादकतम हाला
परदेशी पागल है हो जाता एक बार जो पीता मधुशाला की हाला
कृतक बावरा हो कत्थक है करता मेरी आधुनिक मधुशाला के चौबारे
पीके बाला की सागरमय हाला झूम उठता है चंचल मन मतवाला
तनमन में अगन लगाती यारों रूपसी बाला की मादकतम हाला
परदेशी पागल है हो जाता एक बार जो पीता मधुशाला की हाला
कृतक बावरा हो कत्थक है करता मेरी आधुनिक मधुशाला के चौबारे
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