Monday, 13 June 2016

१८३ मेरी आधुनिक मधुशाला

१८३ मेरी आधुनिक मधुशाला 

पीके बाला की सागरमय हाला झूम उठता है चंचल मन मतवाला 
तनमन में अगन लगाती यारों रूपसी बाला की मादकतम हाला 
परदेशी पागल है हो जाता एक बार जो पीता मधुशाला की हाला 
कृतक बावरा हो कत्थक है करता मेरी आधुनिक मधुशाला के चौबारे 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव