१८२ मेरी आधुनिक मधुशाला
सागरमय अमृतसम मादक हाला पीके दो जिस्म एक जा हो जायेंगे
दो जिस्म एक रूह तले मेरी आधुनिक मधुशाला के उपवन खो जायेंगे
मैं हाला मय और हाला मुझ मय एक दूजे में प्रेमी सैम खो जायेंगे
कृतक अंजान के शब्दों की सुनामी बन सारे जहाँ के पाठको को ललचायेंगे
सागरमय अमृतसम मादक हाला पीके दो जिस्म एक जा हो जायेंगे
दो जिस्म एक रूह तले मेरी आधुनिक मधुशाला के उपवन खो जायेंगे
मैं हाला मय और हाला मुझ मय एक दूजे में प्रेमी सैम खो जायेंगे
कृतक अंजान के शब्दों की सुनामी बन सारे जहाँ के पाठको को ललचायेंगे
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