Monday, 13 June 2016

१८२ मेरी आधुनिक मधुशाला

१८२   मेरी आधुनिक मधुशाला 

सागरमय अमृतसम मादक हाला पीके दो जिस्म एक जा हो जायेंगे 
दो जिस्म एक रूह तले मेरी आधुनिक मधुशाला के उपवन खो जायेंगे 
मैं हाला मय और हाला मुझ मय एक  दूजे में प्रेमी सैम खो जायेंगे 
कृतक अंजान के शब्दों की सुनामी बन सारे जहाँ के पाठको को ललचायेंगे 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव