Monday, 13 June 2016

१८१ मेरी आधुनिक मधुशाला

१८१  मेरी आधुनिक मधुशाला 

तुम उनमुक्त गगन की कारी बदरिया बन साकी आई मेरी मधुशाला 
उमड़ घुमड़ कर ऐसी बरसी झूम उठी रूपसी  सुरबाला की गगरिया 
बाला यु चलती मेरी मेरी मधुशाला जो बन में बिचरती चंचल हिरनिया 
कृतक अंजान की प्रियतमा बावरी यु तड़पत ज्यो जल बिन मछरिया 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव