१८१ मेरी आधुनिक मधुशाला
तुम उनमुक्त गगन की कारी बदरिया बन साकी आई मेरी मधुशाला
उमड़ घुमड़ कर ऐसी बरसी झूम उठी रूपसी सुरबाला की गगरिया
बाला यु चलती मेरी मेरी मधुशाला जो बन में बिचरती चंचल हिरनिया
कृतक अंजान की प्रियतमा बावरी यु तड़पत ज्यो जल बिन मछरिया
तुम उनमुक्त गगन की कारी बदरिया बन साकी आई मेरी मधुशाला
उमड़ घुमड़ कर ऐसी बरसी झूम उठी रूपसी सुरबाला की गगरिया
बाला यु चलती मेरी मेरी मधुशाला जो बन में बिचरती चंचल हिरनिया
कृतक अंजान की प्रियतमा बावरी यु तड़पत ज्यो जल बिन मछरिया
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