Wednesday, 6 July 2016

२३५- मेरी आधुनिक मधुशाला

२३५-   मेरी आधुनिक मधुशाला
पहला पहला अधिकार हमारा फिर जहां पायेगा मादक हाला
बनबाला अब हूर हमारी उससे चहकती मेरी आधुनिक मधुशाला
मैं कृतक अंजान डगर सदियों से प्यासा आज पियूँगा मादक हाला
तन मन सहित रूह तक झूम उठेगी मधुशाला में नचेगा कृतक मतवाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव