२३३- मेरी आधुनिक मधुशाला
कभी इस दघर से कभी उस डगर से नित डगर बदलकर
परदेशी आता मेरी मधुशाला सागर मय मादक हाला पीके
कभी कभी अपने आप को भुलाता अंजान डगर का परदेशी
मधुशाला को दर अपना समझता अंजान डगर का परदेशी
कभी इस दघर से कभी उस डगर से नित डगर बदलकर
परदेशी आता मेरी मधुशाला सागर मय मादक हाला पीके
कभी कभी अपने आप को भुलाता अंजान डगर का परदेशी
मधुशाला को दर अपना समझता अंजान डगर का परदेशी
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