Wednesday, 6 July 2016

२३३- मेरी आधुनिक मधुशाला

२३३-  मेरी आधुनिक मधुशाला

कभी इस दघर से कभी उस डगर से नित डगर बदलकर
परदेशी आता मेरी मधुशाला सागर मय मादक हाला पीके
कभी कभी अपने आप को भुलाता अंजान डगर का परदेशी
मधुशाला को दर अपना समझता अंजान डगर का परदेशी 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव