Thursday, 7 July 2016

सुहानी शाम ढल चुकी

सुहानी शाम ढल चुकी
न जाने तुम कब आओगे

जमाने की हवाँ बदल चुकी
न जाने तुम कब आओगे

राह तकते तकते फिजा बदल चुकी
न जाने तुम कब आओगे

सुखी प्यासी धरती लिहाफ बदल चुकी
न जाने तुम कब आओगे

तेरी राह तकते तकते इन्तहा हो चुकी
न जाने तुम कब आओगे

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव