२५८- मेरी आधुनिक मधुशाला
चौबीसों घंटे स्वागत करती रूपसी बाला मेरी आधुनिक मधुशाला
नहीं कोई भेद किसी करती अपने कोमल कर से पिलाती हाला
सबके संकोच पलक झपकते हरती और पिलाती प्याले पे प्याला
धूम मची है मयखाने में अविरल सबका स्वागत करती बनबाला
चौबीसों घंटे स्वागत करती रूपसी बाला मेरी आधुनिक मधुशाला
नहीं कोई भेद किसी करती अपने कोमल कर से पिलाती हाला
सबके संकोच पलक झपकते हरती और पिलाती प्याले पे प्याला
धूम मची है मयखाने में अविरल सबका स्वागत करती बनबाला
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