Thursday, 7 July 2016

२५८- मेरी आधुनिक मधुशाला

२५८- मेरी आधुनिक मधुशाला

चौबीसों घंटे स्वागत करती रूपसी बाला मेरी आधुनिक मधुशाला
नहीं कोई भेद किसी करती अपने कोमल कर से पिलाती हाला
सबके संकोच पलक झपकते हरती और पिलाती प्याले पे प्याला
धूम मची है मयखाने में अविरल सबका स्वागत करती बनबाला 

No comments:

Post a Comment

खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव