२४४ - मेरी आधुनिक मधुशाला
योगी बन परदेशी आ बैठा आज मेरी आधुनिक मधुशाला
सागरमय लेकर तुरन्त ही आती रम्भा सम रूपसी बाला
ध्यान मगन हो योगी पीता था दिव्य अनुपम मादक हाला
मेरी मधुशाला बनी योगालय बनी रूपसी हाला पिलाती देवबाला
योगी बन परदेशी आ बैठा आज मेरी आधुनिक मधुशाला
सागरमय लेकर तुरन्त ही आती रम्भा सम रूपसी बाला
ध्यान मगन हो योगी पीता था दिव्य अनुपम मादक हाला
मेरी मधुशाला बनी योगालय बनी रूपसी हाला पिलाती देवबाला
No comments:
Post a Comment