Wednesday, 6 July 2016

२३

२४४  - मेरी आधुनिक मधुशाला

योगी बन परदेशी आ बैठा आज मेरी आधुनिक मधुशाला
सागरमय लेकर तुरन्त ही आती रम्भा सम रूपसी बाला
ध्यान मगन हो योगी पीता था दिव्य अनुपम मादक हाला
मेरी मधुशाला बनी योगालय बनी रूपसी हाला पिलाती देवबाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव