Saturday, 30 July 2016

३११ - मेरी आधुनिक मधुशाला / મેરી આધુનિક મધુશાલા / মেরি আধুনিক মধুশালা /meri aadhunik madhushaalaa / ਮੇਰੀ ਆਧੁਨਿਕ ਮਧੂਸ਼ਾਲਾ

उर की ज्वाला बढ़ती जाती पीके बाला की सागरमय मादक हाला
कभी न उदर परदेशी भरता ला और और पिला मुझको  सुरबाला
दिल की इक्षाओं में पंख लगाती कमसिन बाला की अमृत हाला
सांझ ढले उदर फिर कहता उठ चल परदेशी डगर मेरी मधुशाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव