उर की ज्वाला बढ़ती जाती पीके बाला की सागरमय मादक हाला
कभी न उदर परदेशी भरता ला और और पिला मुझको सुरबाला
दिल की इक्षाओं में पंख लगाती कमसिन बाला की अमृत हाला
सांझ ढले उदर फिर कहता उठ चल परदेशी डगर मेरी मधुशाला
कभी न उदर परदेशी भरता ला और और पिला मुझको सुरबाला
दिल की इक्षाओं में पंख लगाती कमसिन बाला की अमृत हाला
सांझ ढले उदर फिर कहता उठ चल परदेशी डगर मेरी मधुशाला
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