जब कभी जहाँ कहीं गुँजती है अरदास तुम्हारी
तेरे सजदें में सर अपने आप या "रब" झुक जाता है
दोनों हाथ उठते है इबादत में तुम्हारी
जिन्दगी में अमृत की बरसात होती है
तेरी महर से अपने आप सभी काम होते हैं
तेरी इबादत से मिलती है सफलता जहाँ में नाम होता है
जेठ के महीने में बरसती है सावन की शबनमी फुहारें या "रब "
सहराओं की मृगमरिचिकायें हकीकत में तब्दील होती है
केशर की महकती है हवायें जिन्दगी में
कलयुग के कल्प वृक्छ का एतबार होता है
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