Monday, 12 September 2016

जिन्दगी से मोहब्बत

रब की अजीमों करीम नेमत है जिन्दगी
जिसे अपनी जिन्दगी से मोहब्बत नही
उसें दुसरों से मोहब्बत है कहने में
आखिर क्यों हिचक नही होती मेरे यार
आखिर कब तक खुद को धोखा देती रहोगी तुम
और मोहब्बत है लेकिन अपनी जिन्दगी से नही प्यार
आखिर कब तक ये कहती रहोगी तुम
जिसे अपनी जिन्दगी से मोहब्बत नही
वह किस बिना पे मुझसे प्यार है कहती है
बिन तेरे जिन्दगी अधुरी है कहती है
बहुत मुश्किल है त्रिया चरित्र समझना मेरे यार
रब ही जाने क्या चीज है मोहब्बत क्या प्यार

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खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव