वक्त सिखाता है ठोकर मारके
इंसा जिसे कभी भुलाता नहीं
जो ठगाता है वक्त के हाथों यार
वो फिर कभी धोखा खाता नही
वक्त के चलते बदलता है मुकद्दर
वक्त के चलते समय से पहते परिपक्वता आती है यार
वक्त के चलते समय से पहले आती है जवानी
वक्त के चलते समय से पहले आता है बुढापा
वक्त के चलते गुम हो जाता है बचपन
वक्त के चलते नचाता है बेवफा यौवन
जिन्दगी की नैया फसती है मझधार में वक्त के चलते
जिन्दगी की नैया लगती है किनारे वक्त के चलते
वक्त के चलते परवाज भरती है मोहब्बत
वक्त के चलते जिन्दगी के रहमों करम को तडपती है मोहब्बत
वक्त किसी का हुआ है न ही किसी का होगा
वक्त किसी के रोके रूका है न किसी के रोके रूकेगा
वक्त की बेरहम मार कृतक अंजान झेल रहा हूँ
बीता बचपन बीती जवानी खेल खेल में यारो बुढापा झेल रहा हूँ
वक्त की वफाओं का मोहताज नहीं हूँ
अपनों कर्तव्य पे यकीं कर मंजिल पा रहा हूँ
जो भी आरजू हमने की जिन्दगी में अपनी
अपने मुकद्दर को कर्मो से झुका रहा हूँ
मनोहर यादव
" अमृत सागर "
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