Thursday, 15 September 2016

परवाज ए परिंदा

आजाद है परिंदा
सारा अम्बर है परिंदे की परवाज के लिये
ता उमृ जारी रहेगीं परवाज उसकी
मंजिल भी पाता है लौटके आता है नीड अपने
दुनियाँ नई बसाता है मोहब्बत लुटाता है
जहाँ को मुठ्ठी में रख उड जाता है वो
मेहनत से जहाँ है
मेहनत से जमीं और आसमाँ है
उमंग है हौसला है
संवक्छद परवाज हेतु नीला आसमाँ है

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव