Saturday, 17 September 2016

नन्हें कदम मुस्कुराहट लिये

नन्हें कदम मुस्कुराहट लिये
डगमगाते हुये आगे बढने लगे
भोर की बेला मे जिन्दगी
कदम दर कदम बढाने लगी है
माँ के आँचल में छूपकर
वो अमृत रस पान करना तेरा
हौले से मुखडा आँचल से निकालकर
वो मुस्कुराहट बिखेरना
नन्हें पैरों पर स्वयं खडे होने की कोशिश करना
लडखडाकर आगे बढना गिरना और संभलना तेरा
उँगली थाम कर चलना वो मुस्कुराना तेरा
मेरे बुढापे की लाठी है तू
यही सोच मेरी जो तेरी भी है
तू थाम लेगा कुबडी मेरी और पकडके उँगली
तुझमें मै खुद का दीदार करता हूँ
ए मेरे बचपन तू फिर लौट आया
तुझसे बेपनाह मोहब्बत सरकार करता हूँ
जिन्दगी की अँजान डगर पे
आगे ही आगे तुम्हें बढते ही जाना
जिन्दगी की डगर पर कभी न तुम डगमगाना
मंजिल राह तकती कबसे तुम्हारी
कभी न पथ पर मेरे दिल के टुकडे घबराना
यौवन ढलता है चँदा की मानिंद
कभी न गुरुर तुम मेरे यार करना
जिन्दगी की डगर मे बदलेंगें मौसम
आंधियो तुफानो से कभी न घबराना
रितु आयेगीं और जायेंगी सदा तुम मुस्कुराहट लबों पे सजाना
जिन्दगी एतबार है एतबार है जिन्दगी
अपने अपनो का साथ सदा तुम निभाना
बहुत लंबी है डगर जिन्दगी की
मोहब्बत करना मोहब्बत तुम लुटाना
जिन्दगी नाम है मोहब्बत का दिल से मोहब्बत का रिश्ता निभाना
अपने अपनों को दिल में बसाकर जिन्दगी का नग्मा तुम गुनगुनाना
जब उमृ ढलने लगे तुम्हारी
जिन्दगी के नग्में तुम सुनाना
रब से करके पक्की यारी
पाक परवरदिगार को दिल में तुम बसाना
हँसते खेलते जिन्दगी के सफर पे तुम बढते ही जाना

मनोहर यादव " अमृत सागर "

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